जीवन की इस लहर में जीवन थोड़ा रुक सा गया है। तना हुआ सीना और जो गर्व था, वो सर अब झुक सा गया है। वो बीते पलों की ठंडक और अब हर एक पल की जलन; दोनों गरमा रही है। तब कोई मुश्किल आते देख मुस्कुराते थे और अब हर एक मुस्कान वो, मुरझा रही है। परंतु इस उथल-पुथल में भी अजब सा सन्नाटा है। हालातों की इस मधुर हाला को लांघु कैसे, ये समझ ना आता है। मेरी भाव-लता से रिसते आंसू को अब, बारिश भी ना छुपा पाएगी। क्रूरता की बेड़ियां तोड़ लगता है मुझे आलिंगन करने, विपदा भी खुद को छुटा ले आएंगी। आखिर इतना सह गया हूं, जिसकी गिनती कोई कर नहीं सकता। क्योंकि टूट चुका हूं इतना कि, अब और गिरने को डर नहीं लगता। जीवन की इस लहर में हां! जीवन थोड़ा रुक सा गया है। तना हुआ सीना और जो गर्व था, वो सर झुक सा गया है। लेकिन कुछ तो है इस समतल में, जहां से मैंने शुरुआत की थी। आसमां अभी भी उतना ही रोचक लगे, देख जिसे मेरे पहले सपने ने उड़ान भरी थी। पिछले प्रयासों ने तो अनुभव सिखा दिए हैं कई; तो चढूंगा जोश से दुगने और अब ऊंचाई का भय है नहीं। तब तो ऊंचाइयों को बस देखने की ललक थी। लेकिन अब छूने नहीं, अब तो आसमां को बस छेदने की सनक ही...
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