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बात नईं

बात नई

आज लिखने बैठा हूॅ, कविता एक नई।
फिर भी बाते सामने आ जाती है पुरानी वहीं।

आज करना था कुछ नूतन, कुछ अच्छा;
परन्तु निकल नही पाता मन की उधेड़बून से कहीं।।

सोचता हूॅ कुछ नवीन, कुछ सृजन, कुछ रोचक;
लेकिन चकित हुआॅ, होकर दुःखी ईरादों पर अपने उन्हीं।।

उड़ना चाहता था गगन से उपर अनंत में;
किंतु गिर पड़ा अथाह खाईओं में मन की किन्हीं।

कुछ ढुंढ़ा मन बहलाने को खिलोना प्रेम का;
पता चला तो रोका मेरी भावना ने, के दूसरा नहीं।।

अबकी बार करेंगे श्रम खुब, दिल और लगन से;
सोकर उठा, फिर भी मन में आएॅ फालतु सपने यूहीं।।
आज लिखने बैठा हूॅ, कविता एक नई...

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